UPPCS प्रारंभिक परीक्षा 2020 · सामान्य अध्ययन I · प्रश्न 120

Read in English · हिंदी अनुवाद: Battle IAS

भारत के उच्चतम न्यायालय ने ‘संविधान के मूल ढाँचे’ का सिद्धांत किस मामले में प्रतिपादित किया?

  1. a गोलकनाथ मामला, 1967
  2. b केशवानंद भारती मामला, 1973
  3. c शंकरी प्रसाद मामला, 1951
  4. d सज्जन सिंह मामला, 1965
उत्तर (b) · Battle IAS द्वारा जाँचा गया

विकल्प (b), 1973 का केशवानंद भारती मामला, सही है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (24 अप्रैल 1973) में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7:6 से निर्णय दिया कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसके ‘मूल ढाँचे’ को नहीं बदल सकती। गोलकनाथ (a, 1967) में कहा गया था कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर ही नहीं सकती। शंकरी प्रसाद (c, 1951) और सज्जन सिंह (d, 1965) में मौलिक अधिकारों में संशोधन की संसद की शक्ति को सही ठहराया गया। अवधारणा: बाद के मामलों, जैसे इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975), मिनर्वा मिल्स (1980) और एस.आर. बोम्मई (1994), ने स्वतंत्र चुनाव, न्यायिक पुनर्विलोकन और पंथनिरपेक्षता को मूल ढाँचे में जोड़ा।

सावधानी

गोलकनाथ (1967) में कहा गया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती; मूल ढाँचे का सिद्धांत केशवानंद (1973) में आया।

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